साहित्य, कला, संस्कृति और सामाजिक सरोकारों के लिये समर्पित राष्ट्रीय वनमाली सृजनपीठ द्वारा सुप्रतिष्ठित कथाकार जगन्नाथ प्रसाद चौबे 'वनमाली' के शिष्य एवं प्रखर कवि, आलोचक, अनुवादक, पत्रकार विष्णु खरे की स्मृति में राष्ट्रीय कविता सम्मान की स्थापना गई है। विष्णु खरे राष्ट्रीय कविता सम्मान के अंतर्गत चार अलग-अलग श्रेणियों में रचनाकारों को सम्मानित किया जायेगा।
राष्ट्रीय वनमाली सृजन पीठ द्वारा प्रत्येक दो वर्षों में विष्णु खरे राष्ट्रीय कविता सम्मान समारोह का आयोजन कर विभिन्न श्रेणियों में चयनित रचनाकारों को अलंकृत किया जाएगा।
विष्णु खरे राष्ट्रीय कविता सम्मान के अंतर्गत रचनाकार को एक लाख रुपये की सम्मान निधि, शॉल, प्रतीक चिन्ह और सम्मान पत्र प्रदान कर अलंकृत किया जाएगा। विष्णु खरे आलोचना सम्मान, विष्णु खरे अनुवाद सम्मान से वरिष्ठ, विष्णु खरे युवा कविता सम्मान के अंतर्गत प्रत्येक रचनाकार को इक्यावन हजार रुपये की सम्मान निधि, शॉल, प्रतीक चिन्ह और सम्मान पत्र प्रदान कर अलंकृत किया जाएगा।
21 फरवरी 2025 अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस पर वनमाली सभागार, स्कोप ग्लोबल स्किल्स विश्वविद्यालय परिसर में आयोजित हुआ सम्मान समारोह
भोपाल– राष्ट्रीय विष्णु खरे कविता सम्मान समारोह का भव्य आयोजन वनमाली सभागार, स्कोप ग्लोबल स्किल्स विश्वविद्यालय, भोपाल परिसर में गरिमामय रूप से आयोजित किया गया। इस अवसर पर कला, साहित्य एवं संस्कृति के लिये समर्पित वनमाली सृजनपीठ द्वारा वनमाली जी के शिष्य एवं प्रखर कवि, आलोचक, अनुवादक, पत्रकार विष्णु खरे की स्मृति में राष्ट्रीय कविता सम्मान से चार अलग-अलग श्रेणियों में रचनाकारों को सम्मानित किया गया। विष्णु खरे आलोचना सम्मान से वरिष्ठ आलोचक, कवि, अनुवादक नंदकिशोर आचार्य (बीकानेर), विष्णु खरे अनुवाद सम्मान से वरिष्ठ अनुवादक ए. अरविंदाक्षन (केरल), विष्णु खरे कविता सम्मान से सुप्रसिद्ध साहित्यकार, कवि, अनुवादक एवं आलोचक लीलाधर मंडलोई (नई दिल्ली) तथा विष्णु खरे युवा कविता सम्मान से युवा कवियत्री सुश्री पार्वती तिर्की (झारखंड) को सम्मानित किया गया।
इस अवसर पर स्वागत वक्तव्य में श्री संतोष चौबे ने कहा "वनमाली कथा समय और राष्ट्रीय विष्णु खरे कविता सम्मान केवल सम्मान देने का मंच नहीं, बल्कि यह एक वैचारिक संगोष्ठी है, जहाँ साहित्यकारों की बहुआयामी दृष्टि हमारे समय के सबसे जटिल सवालों से टकराती है। भाषा, साहित्य और समाज के बदलते परिदृश्य में ऐसे मंचों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। हम उन सभी रचनाकारों को बधाई देते हैं, जिनका सम्मान किया जा रहा है और हमें विश्वास है कि उनकी रचनाएँ ने वाले समय में साहित्य को और समृद्ध करेंगी।"
लीलाधर मंडलोई मूलत: कवि हैं। उनकी कविताओं में छत्तीसगढ़ की बोली की मिठास और वहाँ के जनजीवन का सजीव चित्रण मिलता है। कविता के अलावा लोककथा, लोकगीत, यात्रा वृत्तांत, डायरी, मीडिया, पत्रकारिता तथा आलोचना लेखन की ओर भी उनकी प्रवृत्ति रही है। ‘घर-घर घूमा’, ‘रात-बिरात’, ‘मगर एक आवाज’, ‘देखा-अदेखा’, ‘यह बदमाशी तो होगी’, ‘देखा पहली दफा अदेखा’, ‘उपस्थित है’, ‘समुद्र’ (कविता संग्रह) तथा ‘अंडमान-निकोबार की लोककथाएँ’, ‘चाँद का धब्बा’, ‘पेड़ भी चलते हैं’ आदि उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं। साहित्यिक अवदान के लिए उन्हें प्रतिष्ठित पुश्किन सम्मान, नागार्जुन सम्मान, रज़ा सम्मान, वागीश्वरी सम्मान एवं रामविलास शर्मा सम्मान से सम्मानित किया जा चुका है।
प्रख्यात आलोचक नंदकिशोर आचार्य मूलत: आलोचक हैं। आलोचना के अलावा उन्होंने कविता, नाट्य, शिक्षा, सभ्यता और संस्कृति विषयक विमर्श तथा संपादन के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। उनके 12 कविता संग्रह, 8 नाटक, 7 आलोचना कृतियाँ तथा 12 सामाजिक-दर्शन संबंधी पुस्तकें प्रकाशित हैं। उन्होंने ब्रॉडस्की, लोर्का और आधुनिक अरबी कविताओं सहित अनेक भाषाओं की श्रेष्ठ कविताओं का अनुवाद किया है। उन्हें ‘मीरा पुरस्कार’, ‘बिहारी पुरस्कार’, ‘भुवनेश्वर पुरस्कार’, ‘संगीत नाटक अकादेमी पुरस्कार’, ‘सुब्रह्मण्य भारती पुरस्कार’ तथा ‘साहित्य अकादेमी पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया है।
वरिष्ठ साहित्यकार एवं अनुवादक प्रो. ए. अरविन्दाक्षन महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय, वर्धा के पूर्व कुलपति रहे हैं। वे हमारे समय के महत्वपूर्ण आलोचक, साहित्यकार और अनुवादक हैं। ‘राग लीलावती’, ‘असंख्य ध्वनियों के बीच’, ‘भरापूरा घर’, ‘पतझड़ का इतिहास’, ‘राम की यात्रा’, ‘प्रार्थना एक नदी है’ आदि उनकी प्रतिनिधि कृतियाँ हैं। हिन्दी में बीस आलोचना की पुस्तकें, मलयालम में पाँच आलोचना पुस्तकें, एक उपन्यास, पंद्रह अनूदित पुस्तकें, तेईस संपादित पुस्तकें तथा अंग्रेज़ी में दो पुस्तकें प्रकाशित हैं। उन्हें बीस राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार तथा ‘साहित्य वाचस्पति’ उपाधि सहित अनेक सम्मान प्राप्त हो चुके हैं।
डॉ. पार्वती तिर्की एक युवा कवयित्री हैं। उनका काव्य आदिवासी जीवन, संस्कृति, लोककथाओं और लोकजीवन से गहराई से जुड़ा हुआ है। कविता और लोकगीतों में उनकी विशेष अभिरुचि है। ‘फिर उगना’ उनका प्रमुख कविता संग्रह है। वे कविताओं के साथ-साथ कहानियाँ भी लिखती हैं। उनकी कहानी ‘गिदनी’ वागर्थ में प्रकाशित हुई है। इसके अलावा ‘इन्द्रधनुष’, ‘सदानीरा’, ‘समकालीन’, ‘जनमत’, ‘हिन्दवी’, ‘प्रगतिशील हांक’ आदि पत्रिकाओं में उनकी कविताएँ प्रकाशित हो चुकी हैं।
विष्णु खरे कविता सम्मान समारोह के अवसर पर 'कविता समय' का आयोजन किया गया। इसके अंतर्गत कविता पाठ का आयोजन वरिष्ठ कवि संतोष चौबे की अध्यक्षता में आयोजित किया गया। कार्यक्रम के अध्यक्ष संतोष चौबे ने अपनी लोकप्रिय कविता सुईं, मेरे अच्छे आदिवासियों, प्रेमिका को दी हुई किताब, धरम-करम और छोड़ो यार का पाठ किया। कवि जितेन्द्र श्रीवास्तव ने मानुष राग, प्रेम का विलाप, ओ मेरे देश, प्राथमिकता का व्याकरण आदि कविता सुनाई। कवि बलराम गुमास्ता ने सूचना, शादी की चालीसवीं सालगिरह, उस आदमी के बारे में, खुदीराम बोस की अंतिम यात्रा का वर्णन कविता का पाठ किया। वरिष्ठ कवि एवं उपन्यासकार नीलेश रघुवंशी ने मेरी सहेलियाँ, एक चीज कम, आधी जगह, सुंदरियों, हाई दईया कविता का पाठ किया। कवि निरंजन श्रोत्रिय ने मुझे पसंद है, सौंदर्य, समानुपात, परीक्षा, वॉट्सऐप संदेश, फार्मूला, अंतर बताओं आदि कविता सुनाई। कवि रामकुमार तिवारी ने जगहें घिरी है, किसने सोचा था, सच्चाई छुपाते हैं, हूबहू कविताओं का पाठ किया। कवि महेश वर्मा ने पंख, जलने का गीत, यकीन, गुड्डन के नाम चिट्ठी कविता सुनाई। कवि वाजदा खान ने मुहावरे, चाहत वर्जनाएं हैं, चाँद कविता का पाठ किया। कविता गोष्ठी का संचालन युवा कथाकार एवं वनमाली कथा पत्रिका के संपादक श्री कुणाल सिंह द्वारा किया।